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बुधवार, 26 सितंबर 2018

जग की माया (कविता)

सालों बीते पर समझ सके न
क्या खोया क्या पाया।
क्या है ऐसा इस जग में जो
सबके मन को भाया।
सोचा बहुत समझ में लेकिन 
नही कभी ये आया।
मोह कौन-सा वो जिसने 
सबको है भरमाया।

कौन है किसका 
इस जग में साया।
कौन कहाँ से
जग में है आया ?

राज़ है क्या ये 
किसने जाना!
जैसा देखा
वैसा माना।

पर भूल सके न
जिसे ज़माना।
वो है मानव के
जीवन का तराना।

छोड़ जगत को सबने
एक दिन है जाना।
मिलकर सब जन गाएँ सदा
प्रेम भाव का गाना।

जग में तेरा-मेरा 
क्या है ऐसा!
जो है जैसा
रहेगा वैसा।

लड़-झगड़कर
क्यों फिर रहना।
सबका हो बस
सदा ये कहना।

नाचो गाओ 
हँसो हँसाओ।
न दुःख हो मन में
जब जग से जाओ।

सब कुछ इस जग में है पाया
जग में ही रह जाना है।
मुट्ठी बाँधे आए हैं सब
हाथ पसारे जाना है।

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