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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

डाक दिवस

              समय-समय की बात है, ऐसा कहते अक्सर हम किसी न किसी को सुनते ही हैं। वास्तव में एक वो समय था जब अपनों तक संदेश पहुँचाना आसान काम नहीं था। इस काम को करने में बहुत समय लगता था और ये भी निश्चित नहीं होता था कि जिसे संदेश भेजना है उसे मिल ही जाएगा। प्रतीक्षा और चिंता में लोग एक -एक दिन बिताते थे। उस समय संदेश कबूतरों द्वारा, घुड़सवार संदेशवाहकों द्वारा, मुनादी करवाकर या फिर हरकारों द्वारा भेजे जाते थे।
               फिर समय आया डाकिए का, जो डाक विभाग का एक ऐसा कर्मचारी या  कार्यकर्ता है जो हमारे अपनों द्वारा पत्र  के माध्यम से भेजे गए संदेशों को घर-घर जाकर बाँटता है। डाक विभाग मानव सभ्यता की एक ऐसी कार्य-प्रणाली है जिसके अंतर्गत डाक, मनीऑर्डर, टेलीग्राम, पार्सल और कई बचत योजनाओं की सुविधा हमें मिलती है। बड़ी ही सहजता से इन सभी सुविधाओं का लाभ हमें डाकघरों द्वारा मिलता है।             आज के इस अत्याधुनिक युग में यूँ तो अब पत्रों का चलन बहुत कम हो चला है। मोबाइल, फोन और इंटरनेट की सुविधा से अब अपने अपनों का हाल जानना बहुत ही आसान हो गया है। किंतु डाक विभाग के महत्त्व को आज भी नकारा नहीं जा सकता है। और डाक विभाग की उपयोगिता
और इसकी संभावनाओं को देखते हुए और डाक विभाग की सेवाओं, सुविधाओं और योजनाओं के प्रति आम जन को जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 09 अक्टूबर यानी आज ही के दिन विश्व डाक दिवस मनाया जाता है। साथ ही हमारे देश भारत में 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय डाक दिवस मनाया जाता है।
                 सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों में डाक विभाग की सेवाएँ आज भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। और हमारा देश भारत है भी गाँवों का देश, तो डाक विभाग की सुविधाएँ गाँवों में बसने वाले आम जनों के जीवन को सुखद और सुगम बनाती है। इस बात के लिए हम सभी भारतवासी डाक विभाग के आभारी हैं और भविष्य में और नई योजनाओं और सुविधाओं की उम्मीद के साथ डाक विभाग के सहयोग के आकांक्षी रहेंगे।
              डाक विभाग की सुविधाओं का,
                    जन-जन को लाभ मिलता रहे।
                          डाक विभाग है जन हितकारी,
                               हर देश का हर जन यही कहे।
                                

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

पितरों को भावांजलि ( कविता )

हमारा जीवन
हमारे संस्कार
हमारे पूर्वज ही
हैं इनका आधार।

पितृ पक्ष में
पितरों का श्राद्ध
करना है आवश्यक
क्योंकि वे हैं हमारे आराध्य।

पितरों की आशा
उनकी आत्मा की शांति
होती है सहायक लाने में
अपनों के जीवन में कांति।


विधि- विधान से
करके श्राद्ध और तर्पण
पाएँ सब जन सुख
करके उन्हें भावांजलि अर्पण।

कोई भी आत्मा
कभी भटके नहीं
कर्म क्षेत्र है ये जग
मिले मोक्ष हों सब तृप्त यहीं।


क्यों का संसार ( कविता )

क्यों! क्यों! क्यों!
कभी- कभी
बहुत सारे
क्यों आकर
घेर लेते हैं हमें
हर क्यों का
उत्तर मिल पाना
आसान नहीं होता
हर जगह
हर कोई
फसल नहीं बोता
फिर क्यों ?
उग आते हैंं
इतने सारे क्यों
कभी सुखद
अभी दुःखद
अंत वाले
ये बहुत सारे क्यों
सबके जीवन में
अपना स्थान
बना लेते हैं
कभी सुख- चैन
छीनते हैं
कभी संतुष्टि
जगा देते हैं
ये क्यों
बड़े ही हठीले हैं
महत्वहीन तो नहीं
लगते कुछ
सजीले है!
किसी गूढ़ रहस्य को
खोजने में
हैं ये बड़े समर्थ
कुछ क्यों
ऐसे होते हैंं
जिनका उत्तर ढूँँढ़ना
नहीं होता है व्यर्थ
तो चुनें ऐसे क्यों
जो हों उपयोगी
और जिनका
उत्तर भी बने
सबका सहयोगी।

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

बनाओ पहचान (कविता)

बुरा न देखो
बुरा न सुनो
बुरा न  बोलो
बुरा न सोचो
सत्य को खोजो।
         कुछ ऐसा करो
          कि जब हो अंत
          तो दुनिया रखे याद
          कहलाओ महान संत।
अहिंसा का मार्ग चुनो
कर्मठता को अपनाओ
सादा जीवन, उच्च विचार
जीवन का आधार बनाओ।
           देश के लिए करो
           न्योछावर अपना सर्वस्व
           कृत्य हो ऐसा कि जग में
            हो तुम्हारा वर्चस्व।
स्वार्थ को छोड़ो
जन-जन को जोड़ो
रूढ़ियों को तोड़ो
जीवन को सद्मार्ग पर मोड़ो।
            बनो महान
            हरो अज्ञान
            बनाओ पहचान
            बिखराओ मुस्कान
            और पाओ सम्मान।
         
           

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

जीवन और प्रकृति

                            इस संसार में हर प्राणी के जीवन की एक निश्चित समय सीमा है। कोई भी अजर-अमर नहीं है। यूँ तो हर प्राणी को जीवन मिला है लेकिन मनुष्य को ही विधाता की सर्वोत्कृष्ट रचना माना जाता है। केवल एक मानव ही है जिसके पास एक सभ्य और संस्कारित जीवन जीने की कला, योग्यता और सुअवसर हैंं। जिसके पास बुद्धि, विवेक और भाषा-बोलियाँ हैं जो उसकी भावनाओं, विचारों या उद्गारों की
अभिव्यक्ति की शक्ति हैं और साधन भी।
                    मानव जीवन की अनेक विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य प्राणियों से अलग और विशेष बनाती हैं। मानव जीवन अमूल्य है। इसे अमूल्य बनाना भी जरूरी है । मानव के आचार-विचार और उसका कृत्य इस जगत को बहुत प्रभावित करता है। मानव ही है जो सारी धरा और पर्यावरण के प्रति अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्वयं मानव के लिए और साथ ही धरती के लिऐ भी मानव का रहन-सहन, खान-पान उसकी मूलभूत महत्पूर्ण आवयकताएँ  और उसकी सोच का बहुत महत्व है ।
                    ये धरती केवल एक मानव मात्र की ही नहींं है बल्कि सबकी है। अत: प्रत्येक मानव का भविष्य में मानव जीवन के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि वह क्या सोचे या करे और क्या न करे। मानव का हर एक छोटे से छोटा सोच-समझकर लिया गया निर्णय मानव जीवन को सुरक्षित और खुशहाल बना सकता है। बस जरूरत है ध्यान देने, स्वयं जागरूक होने और दूसरों को जागरूक करने की ताकि किसी से भी ऐसी कोई गलती न हो जो जीवन के लिए घातक हो।
                    इस सुंदर प्रकृति का जो रूप, जो सौंदर्य हमारे पूर्वजों ने देखा उससे बहुत ही बदला और बिगड़ा रूप आज हमारे सामने है। अपनी जिन गलतियों को हम अपनी प्रगति मानकर आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो रहे हैं, हमारी वही गलतियाँ आने वाले समय में हमारे लिए बहुत सारी परेशानियों का कारण बन सकती हैं। भावी पीढ़ी के लिए एक सुंदर प्रकृति का उपहार केवल एक सपना बनकर न रह जाए इसके लिए हमें समय रहते जागरूक होना ही होगा। प्रकृति का कण-कण जीवनदायी है। प्रकृति के सुंदर रूप में ही प्राणीमात्र का जीवन सहज, सुगम और सुरक्षित है। प्रकृति की सुरक्षा में ही हमारे जीवन की रक्षा निहित है। प्रकृति को इसके आभूषण कहे जाने वाले वनों से सजाएँ और अपना जीवन बचाने के लिए ऐसे सार्थक प्रयास करें कि प्रकृति को भी हानि न पहुँचे और जीवन पर मँडराता हर संकट भी टले।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस

                    आज यानी एक अक्टूबर को मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस। ये दिवस समर्पित है सभी बुजुर्गों को। वृद्धजन हमारे समाज और परिवार के सुदृढ़ आधारभूत स्तंभ हैं। उनके आशीर्वादों की छत्र-छाया में ही हम सबकी प्रगति निहित है। उनके अनुभव रात्रि में प्रकाशित होते किसी दीपक के आलोक से कम नहीं हैं। विपरीत परिस्थितियों में संबल दायी उनका वरद हस्त अमूल्य है हम सबके लिए। भले ही उनका शरीर दुर्बल हो लेकिन उनका मनोबल और दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है जो विवेक, धैर्य, साहस और आशा से परिपूर्ण कभी खत्म न होने वाले ज्योति पुंज के समान है।
                    हर बच्चे के जीवन में उसके दादा-दादी और नाना-नानी का महत्वपूर्ण स्थान होता है। दादा-दादी और नाना-नानी से जुड़ी यादें जीवनपर्यंत हमें सुखद अनुभूति कराती हैं। उनके किस्से-कहानियाँ हमें एक अनोखा अनुभव और सीख देती हैं। उनकी बातें और यादें हमें उनके समय से जोड़ती हैंं  साथ ही ये हमें उनके समय की सैर करवाती हुई रोमांचित और आश्चर्यचकित कर देतीं हैं। हमें बहुत ही सुख,  चैन, सुरक्षा और खुशी मिलती है अपने बुजुर्गों के संरक्षण में।  उनसे अपनी बात मनवा लेना कितना आसान होता है और उनका लाड़-प्यार हम कभी भूल ही नहीं सकते हैं।
                    एक विशाल वट वृक्ष के समान हैं हमारे बुजुर्ग जिनकी देख-रेख में हमें इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी जीवन शैली में भी सुख के अविष्मरणीय पल सहेजने और संजोने के लिए मिल पाते हैं। लेकिन आज के इस बदलते समय में हमारी विचारधाराओं में दिनोंदिन परिवर्तन होता जा रहा है। हम अपने बुजुर्गों के महत्व को नकारते जा रहे हैं। हम  अपने आप में और अपने कार्योंं में इतने व्यस्त होते जा रहे हैं कि हमारे पास उनके लिए समय ही नहीं है। अकेलापन उनके लिए एक बीमारी बनता जा रहा है।
                    दिन- प्रतिदिन स्थितियाँ और भी अधिक बिगड़ती जा रही हैं। लोग अपने बुजुर्गों के प्यार, उनकी मेहनत और त्याग को भुलाकर उन्हें बोझ समझने लगे हैं। कई लोग तो इतना नीचे गिर जाते हैं कि वे अपने बुजुर्गों को किसी वृद्धाश्रम में छोड़ने से भी पीछे नहीं हटते। कोई भी जन ये कैसे भूल सकता है कि एक दिन बढ़ती उम्र के साथ-साथ सभी को बुढ़ापे का सामना करना ही है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को ये कैसी शिक्षा और संस्कार दे रहे हैं। क्या हम सच में उसी भारत देश के नागरिक हैं जो अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। क्या हम सच्चे भारतीय कहलाने योग्य हैं ?
                  हमें समय रहते अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों को बचाना ही होगा ताकि भावी पीढ़ी भी इनका अनुसरण करे, अपने कर्तव्यों को समझेंं और इन मान- मर्यादाओं का पालन करेंं। आज के इस बदलते परिवेश में ये आवश्यक है कि कोई भी अपने बुजुर्गों को बोझ न समझे उनका अपमान न करे बल्कि सभी जन सेवा भाव से उनका जीवन सहज बनाने में अपना सहयोग दें। तभी अंतरराष्ट्रीय दिवस को मनाना सार्थक होगा।