आज यानी एक अक्टूबर को मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस। ये दिवस समर्पित है सभी बुजुर्गों को। वृद्धजन हमारे समाज और परिवार के सुदृढ़ आधारभूत स्तंभ हैं। उनके आशीर्वादों की छत्र-छाया में ही हम सबकी प्रगति निहित है। उनके अनुभव रात्रि में प्रकाशित होते किसी दीपक के आलोक से कम नहीं हैं। विपरीत परिस्थितियों में संबल दायी उनका वरद हस्त अमूल्य है हम सबके लिए। भले ही उनका शरीर दुर्बल हो लेकिन उनका मनोबल और दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है जो विवेक, धैर्य, साहस और आशा से परिपूर्ण कभी खत्म न होने वाले ज्योति पुंज के समान है।
हर बच्चे के जीवन में उसके दादा-दादी और नाना-नानी का महत्वपूर्ण स्थान होता है। दादा-दादी और नाना-नानी से जुड़ी यादें जीवनपर्यंत हमें सुखद अनुभूति कराती हैं। उनके किस्से-कहानियाँ हमें एक अनोखा अनुभव और सीख देती हैं। उनकी बातें और यादें हमें उनके समय से जोड़ती हैंं साथ ही ये हमें उनके समय की सैर करवाती हुई रोमांचित और आश्चर्यचकित कर देतीं हैं। हमें बहुत ही सुख, चैन, सुरक्षा और खुशी मिलती है अपने बुजुर्गों के संरक्षण में। उनसे अपनी बात मनवा लेना कितना आसान होता है और उनका लाड़-प्यार हम कभी भूल ही नहीं सकते हैं।
एक विशाल वट वृक्ष के समान हैं हमारे बुजुर्ग जिनकी देख-रेख में हमें इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी जीवन शैली में भी सुख के अविष्मरणीय पल सहेजने और संजोने के लिए मिल पाते हैं। लेकिन आज के इस बदलते समय में हमारी विचारधाराओं में दिनोंदिन परिवर्तन होता जा रहा है। हम अपने बुजुर्गों के महत्व को नकारते जा रहे हैं। हम अपने आप में और अपने कार्योंं में इतने व्यस्त होते जा रहे हैं कि हमारे पास उनके लिए समय ही नहीं है। अकेलापन उनके लिए एक बीमारी बनता जा रहा है।
दिन- प्रतिदिन स्थितियाँ और भी अधिक बिगड़ती जा रही हैं। लोग अपने बुजुर्गों के प्यार, उनकी मेहनत और त्याग को भुलाकर उन्हें बोझ समझने लगे हैं। कई लोग तो इतना नीचे गिर जाते हैं कि वे अपने बुजुर्गों को किसी वृद्धाश्रम में छोड़ने से भी पीछे नहीं हटते। कोई भी जन ये कैसे भूल सकता है कि एक दिन बढ़ती उम्र के साथ-साथ सभी को बुढ़ापे का सामना करना ही है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को ये कैसी शिक्षा और संस्कार दे रहे हैं। क्या हम सच में उसी भारत देश के नागरिक हैं जो अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। क्या हम सच्चे भारतीय कहलाने योग्य हैं ?
हमें समय रहते अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों को बचाना ही होगा ताकि भावी पीढ़ी भी इनका अनुसरण करे, अपने कर्तव्यों को समझेंं और इन मान- मर्यादाओं का पालन करेंं। आज के इस बदलते परिवेश में ये आवश्यक है कि कोई भी अपने बुजुर्गों को बोझ न समझे उनका अपमान न करे बल्कि सभी जन सेवा भाव से उनका जीवन सहज बनाने में अपना सहयोग दें। तभी अंतरराष्ट्रीय दिवस को मनाना सार्थक होगा।
हर बच्चे के जीवन में उसके दादा-दादी और नाना-नानी का महत्वपूर्ण स्थान होता है। दादा-दादी और नाना-नानी से जुड़ी यादें जीवनपर्यंत हमें सुखद अनुभूति कराती हैं। उनके किस्से-कहानियाँ हमें एक अनोखा अनुभव और सीख देती हैं। उनकी बातें और यादें हमें उनके समय से जोड़ती हैंं साथ ही ये हमें उनके समय की सैर करवाती हुई रोमांचित और आश्चर्यचकित कर देतीं हैं। हमें बहुत ही सुख, चैन, सुरक्षा और खुशी मिलती है अपने बुजुर्गों के संरक्षण में। उनसे अपनी बात मनवा लेना कितना आसान होता है और उनका लाड़-प्यार हम कभी भूल ही नहीं सकते हैं।
एक विशाल वट वृक्ष के समान हैं हमारे बुजुर्ग जिनकी देख-रेख में हमें इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी जीवन शैली में भी सुख के अविष्मरणीय पल सहेजने और संजोने के लिए मिल पाते हैं। लेकिन आज के इस बदलते समय में हमारी विचारधाराओं में दिनोंदिन परिवर्तन होता जा रहा है। हम अपने बुजुर्गों के महत्व को नकारते जा रहे हैं। हम अपने आप में और अपने कार्योंं में इतने व्यस्त होते जा रहे हैं कि हमारे पास उनके लिए समय ही नहीं है। अकेलापन उनके लिए एक बीमारी बनता जा रहा है।
दिन- प्रतिदिन स्थितियाँ और भी अधिक बिगड़ती जा रही हैं। लोग अपने बुजुर्गों के प्यार, उनकी मेहनत और त्याग को भुलाकर उन्हें बोझ समझने लगे हैं। कई लोग तो इतना नीचे गिर जाते हैं कि वे अपने बुजुर्गों को किसी वृद्धाश्रम में छोड़ने से भी पीछे नहीं हटते। कोई भी जन ये कैसे भूल सकता है कि एक दिन बढ़ती उम्र के साथ-साथ सभी को बुढ़ापे का सामना करना ही है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को ये कैसी शिक्षा और संस्कार दे रहे हैं। क्या हम सच में उसी भारत देश के नागरिक हैं जो अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। क्या हम सच्चे भारतीय कहलाने योग्य हैं ?
हमें समय रहते अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों को बचाना ही होगा ताकि भावी पीढ़ी भी इनका अनुसरण करे, अपने कर्तव्यों को समझेंं और इन मान- मर्यादाओं का पालन करेंं। आज के इस बदलते परिवेश में ये आवश्यक है कि कोई भी अपने बुजुर्गों को बोझ न समझे उनका अपमान न करे बल्कि सभी जन सेवा भाव से उनका जीवन सहज बनाने में अपना सहयोग दें। तभी अंतरराष्ट्रीय दिवस को मनाना सार्थक होगा।
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